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मुरैना: मानसून के दौरान ग्रामीण क्षेत्रों में सड़क और स्वास्थ्य सुविधाओं की कमी किस तरह लोगों की जान जोखिम में डाल सकती है, इसका चौंकाने वाला मामला मध्य प्रदेश के मुरैना जिले में सामने आया है। कैलरस तहसील के मकुंडा गांव में मुख्य सड़क तक पहुंचने वाला निचला रास्ता सोन नदी का जलस्तर बढ़ने से पानी में डूब गया। इसी बीच घायल महिला को अस्पताल पहुंचाने के लिए ग्रामीणों को खाट और हवा भरे ट्यूब की मदद से उफनती नदी पार करनी पड़ी।
घायल महिला की पहचान कोकिला कुशवाहा के रूप में हुई है। बताया जा रहा है कि वह रात में गिरने के कारण चोटिल हो गई थीं। शुरुआत में परिवार ने उनकी स्थिति पर नजर रखी, लेकिन समय बीतने के साथ उनकी हालत बिगड़ने लगी। इसके बाद परिवार के सदस्यों ने उन्हें इलाज के लिए कैलरस अस्पताल ले जाने का निर्णय लिया। अस्पताल पहुंचने के लिए मकुंडा गांव से मुख्य सड़क तक जाना जरूरी था, लेकिन सोन नदी में आए उफान ने ग्रामीणों का रास्ता रोक दिया।
ग्रामीणों के अनुसार, नदी का जलस्तर बढ़ने से गांव को मुख्य सड़क से जोड़ने वाला निचला रास्ता पूरी तरह पानी में डूब गया था। उस मार्ग पर पैदल चलना या किसी सामान्य वाहन से निकलना संभव नहीं था। दूसरी ओर कोकिला की तबीयत बिगड़ रही थी और उन्हें जल्द अस्पताल पहुंचाना आवश्यक था। ऐसे में परिवार और गांव के लोगों ने सीमित संसाधनों के बीच जोखिम भरा उपाय अपनाया।
ग्रामीणों ने घायल महिला को एक खाट पर लिटाया। इसके बाद खाट को हवा से भरे ट्यूब के साथ मजबूती से बांधा गया, ताकि वह पानी की सतह पर तैर सके। कुछ ग्रामीण नदी में उतरे और खाट को संभालते हुए धीरे-धीरे दूसरे किनारे की ओर लेकर गए। उफनते पानी और तेज बहाव के बीच संतुलन बनाए रखना उनके लिए बड़ी चुनौती थी। जरा-सी चूक महिला के साथ उन्हें भी गंभीर खतरे में डाल सकती थी।
नदी पार करने के दौरान ग्रामीण खाट के चारों ओर रहे। उन्होंने एक-दूसरे का सहारा लेते हुए महिला को सुरक्षित आगे बढ़ाया। खाट के नीचे लगाए गए ट्यूब ने उसे पानी में डूबने से बचाया, जबकि ग्रामीणों ने दोनों तरफ से पकड़कर उसे बहने नहीं दिया। इस पूरी कोशिश में स्थानीय लोगों की तत्परता और साहस दिखाई दिया, लेकिन साथ ही गांव तक सुरक्षित रास्ता और आपातकालीन परिवहन उपलब्ध नहीं होने की गंभीर समस्या भी सामने आई।
दूसरे किनारे पहुंचने के बाद कोकिला को मुख्य सड़क तक ले जाया गया और वहां से कैलरस अस्पताल पहुंचाने की व्यवस्था की गई। घटना का दृश्य ग्रामीण क्षेत्रों में मानसून के समय बनने वाली कठिन परिस्थितियों को उजागर करता है। बारिश के बाद नदी-नालों में पानी बढ़ने से कई गांवों का संपर्क मुख्य मार्गों से कट जाता है। ऐसी स्थिति में बीमार, गर्भवती महिलाओं, बुजुर्गों और दुर्घटना में घायल लोगों को चिकित्सा संस्थानों तक पहुंचाना बेहद मुश्किल हो जाता है।
मकुंडा गांव की घटना में ग्रामीणों की सूझबूझ से घायल महिला को नदी पार करा दिया गया, लेकिन इस तरह का प्रयास सुरक्षित नहीं माना जा सकता। तेज बहाव में खाट या ट्यूब का संतुलन बिगड़ने पर बड़ा हादसा हो सकता था। नदी की गहराई, पानी के अंदर मौजूद गड्ढों और बहकर आने वाली वस्तुओं का अंदाजा लगाना भी कठिन होता है। ऐसे में बिना सुरक्षा उपकरणों के नदी पार करना जानलेवा साबित हो सकता है।
इस घटना ने गांव की सड़क कनेक्टिविटी और स्वास्थ्य सेवाओं तक पहुंच से जुड़े सवाल खड़े कर दिए हैं। ग्रामीण क्षेत्रों में केवल अस्पताल बनाना पर्याप्त नहीं है, बल्कि वहां तक हर मौसम में पहुंचने योग्य सड़क और परिवहन की व्यवस्था भी जरूरी है। अगर बारिश होते ही किसी गांव का मुख्य मार्ग डूब जाता है, तो आपातकालीन परिस्थिति में एंबुलेंस भी वहां नहीं पहुंच सकती। इससे मरीज को समय पर उपचार मिलने की संभावना प्रभावित होती है।
स्थानीय लोगों के सामने मानसून के दौरान यह समस्या और गंभीर हो जाती है। निचले मार्ग पर पानी भरने के बाद उन्हें नदी का जलस्तर कम होने का इंतजार करना पड़ता है या फिर जान जोखिम में डालकर वैकल्पिक रास्ता अपनाना होता है। रोजमर्रा की जरूरतों, बच्चों की पढ़ाई, राशन, खेती और चिकित्सा के लिए मुख्य मार्ग तक पहुंचना आवश्यक होता है। संपर्क टूट जाने पर गांव के लोगों की परेशानी कई गुना बढ़ जाती है।
ग्रामीणों का कहना है कि गांव को मुख्य सड़क से जोड़ने के लिए ऐसा स्थायी मार्ग बनाया जाना चाहिए, जो नदी का जलस्तर बढ़ने पर भी सुरक्षित रहे। ऊंचे पुल या पुलिया की व्यवस्था होने से मानसून में आवागमन बाधित नहीं होगा। इसके साथ ही गांवों के लिए आपातकालीन नाव, प्रशिक्षित बचाव दल और स्वास्थ्य सहायता की व्यवस्था भी उपयोगी हो सकती है। बारिश के मौसम से पहले प्रशासन द्वारा संवेदनशील मार्गों का सर्वेक्षण कर वैकल्पिक व्यवस्था तैयार करना आवश्यक माना जा रहा है।
यह मामला ग्रामीण स्वास्थ्य व्यवस्था की चुनौतियों की ओर भी ध्यान खींचता है। गंभीर मरीज के लिए उपचार में होने वाली थोड़ी-सी देरी भी नुकसानदायक हो सकती है। मकुंडा गांव में कोकिला की हालत बिगड़ने पर परिजनों को पहले नदी पार करने का जोखिम उठाना पड़ा और उसके बाद अस्पताल तक का सफर तय करना पड़ा। यदि गांव तक एंबुलेंस पहुंचने योग्य सड़क होती, तो उन्हें ऐसे खतरनाक तरीके का सहारा नहीं लेना पड़ता।
घटना के बाद स्थानीय स्तर पर स्थायी समाधान की मांग उठना स्वाभाविक है। ग्रामीणों ने अपनी सूझबूझ से मुश्किल परिस्थिति का सामना किया, लेकिन बुनियादी सुविधा के अभाव में नागरिकों से बार-बार ऐसा जोखिम उठाने की अपेक्षा नहीं की जा सकती। प्रशासन से उम्मीद की जा रही है कि वह गांव के संपर्क मार्ग की स्थिति का निरीक्षण कर आवश्यक कदम उठाएगा।
मकुंडा की घटना केवल एक घायल महिला को नदी पार कराने की कहानी नहीं है, बल्कि मानसून में ग्रामीण बुनियादी ढांचे की कमजोरियों की तस्वीर भी है। खाट और ट्यूब से बनी अस्थायी व्यवस्था ने कोकिला को अस्पताल तक पहुंचने का रास्ता जरूर दिया, लेकिन इसने यह भी दिखाया कि सुरक्षित सड़क, पुल और त्वरित चिकित्सा परिवहन ग्रामीण जीवन के लिए कितने आवश्यक हैं।





